Khatu Shyam Ji

Khatu Shyam Ji (खाटू श्याम जी) की कहानी:

 
आपने बाबा खाटू श्याम जी के बारे में ज़रूर सुना होगा और ये भी सम्भव हैं कि आप बाबा खाटू श्याम के भक्तों में से एक हो। और आज हम उन्ही के बारे में बात करने वाले हैं।
 
जिनके लिए बोला जाता हैं हारे का सहारा खाटू श्याम हमारा।
 
Khatu Shyam Ji (बाबा खाटू श्याम जी) का मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले में स्थित हैं और यँहा भक्तों की भीड़ बाबा के दर्शन के लिए सदैव आतुर रहती हैं।
 
होली के त्योहार से पहले यहाँ मेले का आयोजन होता हैं और बाबा के भक्तों में इस अवसर पर अलग उत्साह देख़ा जा सकता हैं। 
 
बाबा खाटू श्याम जी की कहानी महाभारत काल से शुरू होती हैं। और वो क़ोई और नहीं बल्कि महाभारत काल के सबसे शक्तिशाली योद्धा वीर बर्बरिक (Khatu Shyam Ji) है। जो भीम के पोत्तर और घटोटकक्ष के पुत्र हैं। 
 
बर्बरिक (Khatu Shyam Ji) की तपस्या:
बर्बरिक बचपन से शस्त्र कला में निपुण थे और ये विद्ध्या उन्होंने अपनी माता से अर्जित की थी। बर्बरिक माँ आदि शक्ति के सच्चे भक्त थे और एक बार उन्होंने माँ आदि शक्ति की कठोर तपस्या की। माँ आदि शक्ति ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होक़र बर्बरिक को दर्शन दिए और कहा मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ बताओ पुत्र क्या वर चाहते हों। तब बर्बरिक ने कहा कि माँ मुझे सिर्फ़ आपका आशीर्वाद चाहिए जिससे मैं अपना जीवन दिन-दुखियों और हारे हुए लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर सकूँ। 
 
माँ आदि शक्ति बर्बरिक़ को कहती हैं ऐसा ही होगा पुत्र और मैं तुम्हें ऐसी शक्ति प्रदान करूँगी जो न आज से पहले किसी के पास थी और न ही भविष्य में किसी के पास होगी। माँ आदि शक्ति बरबरिक को 3 बाण प्रदान करती हैं और कहती हैं कि ये कोई साधारण बाण नहीं बल्कि ये बाण अपने लक्ष्य को भेदकर वापस अपने तरकस में आ जाएँगे। और इन शक्तियों के साथ तुम्हें हरा पाना किसी के लिए भी असम्भव होगा।
 
कुछ कहानियाँ में ये वर्णन भी हैं कि ये ३ बाण बर्बरिक को उन्हें उनके गुरु ने दिए थे। और उनसे वचन माँगा था कि वो सदैव हारे का सहारा बनेंगे और जो भी निर्बल होगा उसका ही साथ देंगे।
 
इन तीनों बाणों की महिमा कुछ इस प्रकार थी:
  • इसमें से पहला बाण अपने लक्ष्यों को एक जगह एकत्रित करता था।
  • दूसरा बाण अपने लक्ष्यों को समाप्त करता था।
  • और तीसरे बाण की कभी आवश्यकता ही नही पड़ती थी वो अतरिक्त बाण तरकस में सदैव बना रहता था। 
महाभारत और बर्बरिक (Khatu Shyam Ji):
जब बर्बरिक को पता चला कि महाभारत का युद्ध होने वाला हैं तो वो अपनी माता से आशीर्वाद लेकर महाभारत के युद्ध में हिस्सा लेने के लिए निकल गए।
 
ये तो हम सब जानते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण अंतर्यामी हैं। और जब वासुदेव कृष्ण को ये पता चला कि बर्बरिक महाभारत के युद्ध में हिस्सा लेने आ रहे हैं तो वो समझ गए कि अगर बर्बरिक युद्ध में हिस्सा लेंगे तो महाभारत का युद्ध कभी निर्णायक नहीं होगा।  
 
क्योंकि बर्बरकि हारने वाले और निर्बल पक्ष की तरफ़ से युद्ध करेंगे। तो अगर युद्ध में कौरव क़मज़ोर होने लगे तो वो उनकी तरफ़ से युद्ध लड़ेंगे और अगर पांडव क़मज़ोर पड़ने लगे तो वो पंडवो की ओर से युद्ध लड़ेंगे। इस तरह दोनों सेनाओं को हानि होगी और सब को बर्बरिक के हाथों मृत्यु के घाट उतरना पड़ेगा। और अंत में अगर क़ोई बचेगा तो वो होंगे सिर्फ़ वीर बर्बरिक।  
 
कुछ कहानियाँ कहती हैं कि भगवान कृष्ण ब्राह्मण का रूप बनाकर बर्बरिक के पास गए जबकि BR चोपड़ा जी की महाभारत में दिखाया गया हैं कि भगवान कृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में ही बर्बरिक के पास जाते हैं और उनसे उनके तीरों की ताक़त को प्रदर्शित करने के लिए एक पेड़ की तरफ़ ईशारा करते हुए कहते हैं कि अगर तुम्हारे तीर सच में शक्तिशाली हैं तो इस पेड़ के सभी पत्तों में अपने तीर से छिद्र करके दिखाओं और ध्यान रहें की क़ोई पत्ता छूट न जाए और भगवान श्री कृष्ण चालाकी से एक पत्ते को अपने पैर के नीचे दबा लेते हैं। 
 
बर्बरिक (Khatu Shyam Ji) और कृष्ण भगवान की मृत्यु का सम्बन्ध:
बर्बरिक का तीर पेड़ के सभी पत्तों में छिद्र करते हुए भगवान कृष्ण के उस पैर में जा लगता हैं जिसके नीचे उन्होंने पत्ता दबाया था। और बर्बरकि भगवान कृष्ण के पैरों से तीर निकालते हुए उनसे क्षमा माँगते हुए कहते हैं पता नहीं ये एक पत्ता आपके पैर के नीचे कैसे आ गया। और तब भगवान कृष्ण कहते हैं कि ये पत्ता मैंने जानबूझकर अपने पैर के नीचे दबाया था ताकि मैं ये देख़ सकूँ कि क्या तुम्हारे तीर अपने छुपे हुए लक्ष्य को ढूँढ पाते हैं या नही।
 
कहा जाता हैं कि बर्बरिक के तीर से भगवान कृष्ण का वो पैर क़मज़ोर पड गया था और ज़रा नाम के बहेलिये का तीर भगवान कृष्ण के उसी पैर मैं लगा था जिससे उनकी मृत्यु हुई थी।
 
बर्बरिक के तीरों की ताक़त देखने के बाद भगवान कृष्ण उन्हें समझाते हैं हुए कहते हैं कि अगर तुम युद्ध में हिस्सा लोगे तो ये युद्ध निर्णयहीन रहेगा। 
 
बर्बरिक़ अपने गुरु को दिए हुए वचन कि वो किसी को हारने नहीं देंगे से उत्पन हुए संकट को समझ जाते हैं। चूँकि वो भगवान कृष्ण को अपना मार्गदर्शक और अपना गुरु भी मानते थे तो वो भगवान कृष्ण से ही इस संकट का उपाय पुछते हैं। 
 
 कृष्ण भगवान की गुरुदक्षिणा और बर्बरिक (Khatu Shyam Ji) का शीश दान:
और वासुदेव कृष्ण बर्बरिक से कहते हैं कि वो युद्ध में हिस्सा न ले लेकिन बर्बरिक अपनो के विरूध हो रहें युद्ध में हिस्सा न ले इसके लिए सहमत नहीं होते और वो भगवान कृष्ण से क़ोई और मार्ग दिखाने के लिए की प्रार्थना करते हैं। और भगवान कृष्ण कहते हैं कि फ़िर तो सिर्फ़ एक ही मार्ग शेष रह जाता हैं और वो हैं कि अगर तुम मुझे अपना गुरु मानते हो तो मुझे गुरुदक्षिणा में अपना शीश दे दो। 
 
और बर्बरिक कहते हैं कि मैं आपको अपना शीश सहर्ष गुरुदक्षिणा में देने के लिए आतुर हूँ। और ये मेरा सौभग्य होगा कि मैं आपके लिए कुछ कर पाया किंतु मैंने सुना हैं महाभारत जैसा युद्ध न आज से पहले हुआ हैं और न कभी होगा। दुःख तो मुझे इस बात का हैं कि मैं इस महा युद्ध को अपने नेत्रों से देख़ नहीं पाऊँगा। फ़िर भगवान कृष्ण कहते हैं कि अगर तुम्हारी ये इच्छा हैं तो इसे पूर्ण करना मेरा धर्म हैं। 
 
बर्बरिक पुछते हैं कि ये कैसे सम्भव हैं और भगवान कृष्ण कहते हैं कि तुम्हारा शीश धड़ से अलग होने के बाद भी अपने नेत्रों से सब कुछ देख़ पाएगा, तुम्हारे कान सब कुछ सुन पाएँगे और तुम्हारा मस्तिष्क सब बातों को परखने की क्षमता रखेगा।
 
इसके बाद बर्बरिक का शीश युद्ध भूमि के पास एक ऐसी चट्टान पर लगाया जाता हैं जहां से वो महाभारत के युद्ध के साक्षी बनते हैं। कहा जाता हैं कि अर्जुन और संजय के अलावा बर्बरिक भी थे जिन्होंने गीता ज्ञान सुना था। 
 
महाभारत के युद्ध में कौरवों पर विजयी होने के बाद पांडवों में इस बात को लेकर बहस हो गयी कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता हैं तब भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि तुम लोग आपस में बहस मत करो। बर्बरिक युद्ध के साक्षी हैं वो ही बता देंगे कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता हैं। जब बर्बरिक से ये पूछा जाता हैं तो वो कहते हैं कि मैंने इस युद्ध में वासुदेव कृष्ण के सुदर्शन चक्र को ही सबका संघार करते हुए देखे हैं। और सारे पंडवो को अहसास हो जाता हैं कि पांडवों की विजय सिर्फ़ भगवान कृष्ण के कारण ही सम्भव हुईं हैं। 
 
बर्बरिक का खाटू श्याम जी महाराज (Khatu Shyam Ji) बनना:
बर्बरिक के शीश त्याग को अमूल्य बताते हुए भगवान कृष्ण उन्हें ये वरदान देते हैं कि कलयुग में तुम मेरे ही रूप में पूजे ज़ाओगे और निर्बल और हारे हुए लोगों की सबसे बड़ी आशा तुम में ही निहित होगी। 
 
 

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